Editorial



……………………………………………………………………

खाद्य सुरक्षा सड़ता अनाज और चुनाव

यूपीए-2 को खाद्य सुरक्षा बिल लाने में जल्दी है क्योंकि अगले साल लोकसभा के चुनाव होने वाले हैं। कयास तो यह लगाया जा रहा है कि कुछ ही महीनों की बात है लोकसभा भंग हो सकती है। यूपीए की चेयरपर्सन और कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी के दिल से जुड़ी हुई योजना है। यह महत्वाकांक्षी  खाद्य सुरक्षा विधेयक पिछले लोकसभा पत्र में पारित नहीं हो पाया था। इस विधेयक का विरोध विपक्षी दल की नहीं कांग्रेस के घटक दलों के और खुद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मंत्री भी विरोध कर रहे थे। यह मसला आज भी लटका पड़ा है। सरकार इसे अध्यादेश के रूप में लाकर अपना चुनावी मकसद प्राप्त करना चाहती है लेकिन आज तक सरकार के भीतर और बाहर मतभेद बरकरार है। इस विधेयक को अध्यादेश के जरिए लागू करने के प्रस्ताव पर पिछले गुरुवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल में अलग-अलग मत उभरने के मद्देनजर अध्यादेश का इरादा भी फिलहाल त्याग देना पड़ा है। लंबे अरसे से प्रस्तावित इस योजना को अध्यादेश के जरिए लागू करने के प्रस्ताव पर मंत्रिमंडल में कोई फैसला न होने के बाद तय किया गया है कि इस विधेयक को संसद के विशेष अधिवेशन के जरिए पारित कराने के लिए विपक्ष का समर्थन जुटाया जाए। इस विधेयक का उद्देश्य देश की 67 प्रतिशत आबादी को राशन की दुकानों के जरिए 1 से 3 रुपये प्रति किलोग्राम की निर्धारित दरों पर प्रति माह पांच-पांच किग्रा खाद्यान्न प्राप्त करने का कानूनी अधिकार दिलाना है। विपक्षी दलों में प्रमुख भाजपा तथा वाम दलों ने संसद के विशेष सत्र बुलाने की मांग की थी जबकि सरकार इसे उनकी मांग को दरकिनार कर अध्यादेश के जरिए पारित करना चाहती थी लेकिन सरकार के भीतर ही मतभेदों के चलते अब संसद का विशेष सत्र बुलाकर पारित कराने के प्रयास किए जा रहे हैं।
देश में खाद्यान्न के उत्पादन की स्थिति संतोषजनक होने के बावजूद खाद्यान्न के भंडारण की जो स्थिति है, वह किसी तरह से संतोषजनक नहीं है। कई राज्यों में खाद्यान्नों के भंडारण की बदइंतजामी की वजह से हर फसल के बाद लाखों टन खाद्यान्न खुले में रखे होने से वर्षा या अन्य कारणों से सड़ जाता है। खाद्य वितरणतंत्र में भ्रष्टाचार का दीमक लग गया है। करना तो सरकार को यह चाहिए था कि वितरण-व्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिश करती और भारतीय खाद्य निगम में भ्रष्टाचार के दीमकों और चूहों को समाप्त करने के लिए कारगर तंत्र की व्यवस्था करती। लेकिन सरकार को तो वोटों पर नजर है। उसे तो शासनतंत्र को सड़ी-गली अवस्था में ही रखना है। विश्‍व को दिखाना है कि हम अपनी विशाल भूखी जनता के पेट भरने के लिए कितने महान कदम जुटा रहे हैं। उधर अमेरीकी कृषि विभाग ने इस साल भारत में गेहूं की पैदावार घटने का अनुमान लगाया है।